श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 17

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 3 मिनट का पठन 126 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः | आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ||१७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
य
जो
तु
लेकिन
आत्मरति
आत्मा में रति रखने वाला
एव
ही
स्यात्
हो
आत्मतृप्त
आत्मा में तृप्त
च
और
मानव
मनुष्य
आत्मनि
अपने आप में
एव
ही
च
और
सन्तुष्ट
संतुष्ट
तस्य
उसके
कार्यम्
कर्तव्य (विहित कर्म)
न
नहीं
विद्यते
है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु जो मनुष्य केवल आत्मा में ही रति रखता है, आत्मा में ही तृप्त है और आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य (विहित कर्म) नहीं रह जाता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यहाँ भगवान उन सिद्ध पुरुषों की बात करते हैं जो पूर्ण रूप से आत्म-संतुष्ट हैं। ऐसे ज्ञानी को कर्म करने की कोई बाध्यता नहीं, क्योंकि वह कर्मफल पर निर्भर नहीं। फिर भी, वे लोकसंग्रह के लिए कर्म करते हैं, जैसा आगे बताया जाएगा। Here the Lord speaks of the perfected souls who are completely self-satisfied. Such a wise person has no obligatory duties because they are not dependent on the fruits of action. Yet, they still act for the welfare of the world, as will be explained.

श्लोक का अर्थ / Meaning

जो आत्मा में ही रमण करता है और आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं। One who delights in the Self and is satisfied with the Self has no duty to perform.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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