श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 18

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 2 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन | न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ||१८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
न
नहीं
एव
ही
तस्य
उसके
कृतेन
किए गए कर्म से
अर्थ
प्रयोजन
न
नहीं
अकृतेन
न किए गए कर्म से
इह
इस लोक में
कश्चन
कुछ भी
न
नहीं
च
और
अस्य
इसके
सर्वभूतेषु
सब प्राणियों में
कश्चित्
कोई
अर्थव्यपाश्रय
प्रयोजन के लिए आश्रय।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उस (आत्मसंतुष्ट पुरुष) के लिए न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन है और न कर्म न करने से। उसका सब भूतों में किसी प्रयोजन के लिए आश्रय नहीं है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ऐसे ज्ञानी की स्वतंत्रता का वर्णन – उसे किसी कर्म से कुछ मिलना नहीं है, और न करने से कुछ छूटता नहीं। वह किसी पर आश्रित नहीं। The description of the liberated one – he has nothing to gain from action and nothing to lose from inaction. He depends on nothing.

श्लोक का अर्थ / Meaning

आत्मसंतुष्ट पुरुष के लिए कर्म करने या न करने से कुछ लाभ-हानि नहीं, वह किसी पर आश्रित नहीं। The self-satisfied has no benefit from action or inaction; he depends on nothing.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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