मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर | असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ||१९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदतस्मात्
इसलिए
असक्तः
आसक्ति रहित
सततम्
निरन्तर
कार्यम्
कर्तव्य
कर्म
कर्म
समाचर
अच्छी तरह से कर
असक्त
आसक्ति रहित
हि
निश्चय ही
आचरन्
करता हुआ
कर्म
कर्म
परम्
परम (गति)
आप्नोति
प्राप्त करता है
पूरुष
मनुष्य।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इसलिए आसक्ति रहित होकर निरन्तर कर्तव्य-कर्म को अच्छी तरह से कर। क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करने वाला मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह कर्मयोग का सार है – आसक्ति रहित होकर कर्तव्य करो। यही परम पद की प्राप्ति का मार्ग है। This is the essence of Karma Yoga – perform your duty without attachment. This is the path to the Supreme.
श्लोक का अर्थ / Meaning
इसलिए आसक्ति छोड़कर नियत कर्म करो, क्योंकि ऐसा करने से मनुष्य परम पद पाता है। Therefore, perform your duty without attachment, for by such action one attains the Supreme.