श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 20

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 3 मिनट का पठन 121 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः | लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ||२०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
कर्मणा
कर्म से
एव
ही
हि
निश्चय ही
संसिद्धिम्
सिद्धि को
आस्थिता
प्राप्त हुए
जनकादय
जनक आदि
लोकसंग्रहम्
लोकसंग्रह (लोगों के कल्याण)
एव
ही
अपि
भी
सम्पश्यन्
देखते हुए
कर्तुम्
करने के लिए
अर्हसि
तू योग्य है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जनक आदि राजर्षि भी कर्म द्वारा ही सिद्धि को प्राप्त हुए थे। तू भी लोकसंग्रह (लोगों के कल्याण) को देखते हुए कर्म करने को योग्य है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान अब उदाहरण देते हैं – राजा जनक जैसे ज्ञानी भी कर्म करते थे। इसलिए अर्जुन को भी लोककल्याण के लिए कर्म करना चाहिए, भले ही वह स्वयं मुक्त क्यों न हो। The Lord gives examples – even enlightened kings like Janaka performed action. Therefore Arjuna should also act for the welfare of the world, even if he himself is liberated.

श्लोक का अर्थ / Meaning

जनक जैसे राजर्षि भी कर्म से सिद्ध हुए, अतः तू भी लोकसंग्रह के लिए कर्म कर। Janaka and others attained perfection through action; therefore you also should act for public welfare.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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