मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन | नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ||२२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदन
नहीं
मे
मेरे लिए
पार्थ
हे पार्थ
अस्ति
है
कर्तव्यम्
कर्तव्य
त्रिषु
तीनों
लोकेषु
लोकों में
किञ्चन
कुछ भी
न
नहीं
अनवाप्तम्
न प्राप्त
अवाप्तव्यम्
प्राप्त करने योग्य
वर्ते
लगा रहता हूँ
एव
ही
च
और
कर्मणि
कर्म में।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरा कोई कर्तव्य नहीं है, न कोई वस्तु अप्राप्त है जिसे प्राप्त करना है, फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान स्वयं का उदाहरण देते हैं – यद्यपि वे परमेश्वर हैं और उनके लिए कुछ भी कर्तव्य नहीं, फिर भी वे लोकसंग्रह के लिए कर्म करते हैं। The Lord gives His own example – although He is the Supreme Lord and has no duty, He still acts for the welfare of the world.
श्लोक का अर्थ / Meaning
यद्यपि भगवान को कुछ प्राप्त करना नहीं, फिर भी वे लोकहित के लिए कर्म करते हैं। Although the Lord has nothing to gain, He still acts for the welfare of the world.