मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् | सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ||२४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदउत्सीदेयु
नष्ट हो जाएँ
इमे
ये
लोका
लोक
न
नहीं
कुर्याम्
करूँ
कर्म
कर्म
चेत्
यदि
अहम्
मैं
सङ्करस्य
वर्णसंकर का
च
और
कर्ता
करने वाला
स्याम्
होऊँ
उपहन्याम्
नष्ट करूँ
इमा
इन
प्रजा
प्रजाओं को।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सारे लोक नष्ट हो जाएँ। मैं वर्णसंकर का कर्ता होऊँ और इन प्रजाओं का नाश करने वाला बनूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान यहाँ सामाजिक व्यवस्था के लिए कर्म की अनिवार्यता बताते हैं। यदि वे (या श्रेष्ठजन) कर्म न करें, तो समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी। The Lord emphasises the necessity of action for social order. If He (or the great) ceases to act, chaos will prevail.
श्लोक का अर्थ / Meaning
यदि मैं कर्म न करूँ तो लोक नष्ट हो जाएँ और अव्यवस्था फैले। If I do not act, the worlds would be destroyed and chaos would ensue.