मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत | कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ||२५||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदसक्ता
आसक्त
कर्मणि
कर्म में
अविद्वांस
अज्ञानी लोग
यथा
जैसे
कुर्वन्ति
करते हैं
भारत
हे भारत (अर्जुन)
कुर्यात्
करे
विद्वान
ज्ञानी
तथा
वैसे ही
असक्त
आसक्ति रहित
चिकीर्षु
इच्छा रखने वाला
लोकसंग्रहम्
लोकसंग्रह की।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे भारत! जैसे अज्ञानी लोग कर्म में आसक्त होकर करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को आसक्ति रहित होकर लोकसंग्रह की इच्छा से कर्म करना चाहिए।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान अब ज्ञानी और अज्ञानी के कर्म में अंतर बताते हैं – दोनों कर्म करते हैं, लेकिन एक आसक्ति से, दूसरा आसक्ति रहित। ज्ञानी का उद्देश्य लोकसंग्रह होता है। The Lord now distinguishes the actions of the wise and the ignorant – both act, but one is attached, the other unattached. The wise act for public welfare.
श्लोक का अर्थ / Meaning
जैसे अज्ञानी आसक्ति से कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को आसक्ति रहित होकर लोकसंग्रह के लिए कर्म करना चाहिए। As the ignorant act with attachment, the wise should act without attachment for the welfare of the world.