मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् | जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ||२६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदन
नहीं
बुद्धिभेदम्
बुद्धि में भेद
जनयेत्
उत्पन्न करे
अज्ञानाम्
अज्ञानियों की
कर्मसङ्गिनाम्
कर्म में आसक्त लोगों की
जोषयेत्
लगाए रखे
सर्वकर्माणि
सब कर्मों में
विद्वान्
ज्ञानी
युक्त
युक्त (समाहितचित्त)
समाचरन्
स्वयं आचरण करता हुआ।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
ज्ञानी पुरुष को कर्मासक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भेद (विक्षेप) नहीं डालना चाहिए, बल्कि स्वयं युक्त होकर सब कर्मों का आचरण करता हुआ उन्हें भी कर्मों में लगाए रखना चाहिए।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ज्ञानी का कर्तव्य है कि वह अज्ञानियों को उनके कर्मों से विमुख न करे, बल्कि स्वयं आदर्श प्रस्तुत करते हुए उन्हें कर्तव्यपथ पर बनाए रखे। यह एक सामाजिक उत्तरदायित्व है। It is the duty of the wise not to discourage the ignorant from their duties, but to keep them engaged in action by setting an example themselves. This is a social responsibility.
श्लोक का अर्थ / Meaning
ज्ञानी को चाहिए कि वह अज्ञानियों के कर्म में बाधा न डाले, बल्कि स्वयं युक्त होकर उन्हें कर्म में लगाए रखे। The wise should not disturb the ignorant who are attached to action; instead, by performing actions themselves, they should keep them engaged.