मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः | अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ||२७||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदप्रकृते
प्रकृति के
क्रियमाणानि
किए जाते हुए
गुणै
गुणों द्वारा
कर्माणि
समस्त कर्म
सर्वश
सभी प्रकार से
अहङ्कारविमूढात्मा
अहंकार से मोहित हुआ जीव
कर्ता
कर्ता
अहम्
मैं
इति
इस प्रकार
मन्यते
मानता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा ही किए जाते हैं। फिर भी अहंकार से मोहित जीव "मैं कर्ता हूँ" ऐसा मानता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह गीता का एक प्रमुख सिद्धान्त है – वास्तव में कर्म तो प्रकृति के गुण करते हैं, पर अहंकार के कारण जीव अपने को कर्ता समझ लेता है। इसी भ्रम से बन्धन होता है। This is a key teaching of the Gita – actions are actually performed by the guṇas of nature, but due to ego, the soul considers itself the doer. This delusion causes bondage.
श्लोक का अर्थ / Meaning
प्रकृति के गुण कर्म करते हैं, पर अहंकारी जीव स्वयं को कर्ता मानता है। The guṇas of nature perform actions, but the egoistic soul thinks, "I am the doer."