मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः | गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ||२८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदतत्त्ववित्
तत्त्व को जानने वाला
तु
लेकिन
महाबाहो
हे महाबाहो (अर्जुन)
गुणकर्मविभागयो
गुणों और कर्मों के विभाग का
गुणा
गुण
गुणेषु
गुणों में
वर्तन्ते
व्यवहार करते हैं
इति
इस प्रकार
मत्वा
जानकर
न
नहीं
सज्जते
आसक्त होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
परन्तु हे महाबाहो! गुणों और कर्मों के विभाग के तत्त्व को जानने वाला यह समझकर कि "गुण गुणों में बरत रहे हैं", आसक्त नहीं होता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ज्ञानी जानता है कि इन्द्रियाँ और विषय – ये सब गुणों की लीला हैं, इसलिए वह आसक्त नहीं होता। वह साक्षी भाव से रहता है। The wise person knows that the senses and their objects are all a play of the guṇas; therefore he remains unattached, like a witness.
श्लोक का अर्थ / Meaning
तत्त्वज्ञ यह जानता है कि गुण ही गुणों में क्रिया कर रहे हैं, इसलिए वह आसक्त नहीं होता। The knower of truth understands that the guṇas are acting among themselves; therefore he does not become attached.