श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 30

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 2 मिनट का पठन 125 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा | निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ||३०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
मयि
मुझमें
सर्वाणि
सब
कर्माणि
कर्मों को
संन्यस्य
समर्पित करके
अध्यात्मचेतसा
अध्यात्म-बुद्धि से
निराशी
आशा (फल की इच्छा) रहित
निर्मम
ममता रहित
भूत्वा
होकर
युध्यस्व
युद्ध कर
विगतज्वर
ज्वर (शोक) रहित।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मुझमें सब कर्मों का समर्पण करके, अध्यात्म-बुद्धि से युक्त हो, आशा-आकांक्षा रहित, ममता रहित और शोकरहित होकर युद्ध कर।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह अर्जुन के लिए प्रत्यक्ष आदेश है – सब कर्म कृष्ण को समर्पित करो, निराशी और निर्मम होकर युद्ध करो। यही कर्मयोग की चरम सीख है। This is the direct command to Arjuna – surrender all actions to Krishna, be free from desire and possessiveness, and fight. This is the ultimate teaching of Karma Yoga.

श्लोक का अर्थ / Meaning

सब कर्म भगवान को अर्पण कर, आशा-ममता छोड़कर, शोकरहित हो युद्ध कर। Renouncing all actions to God, free from desire and possessiveness, fight without sorrow.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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