मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः | श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ||३१||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदये
जो
मे
मेरे
मतम्
मत (उपदेश) को
इदम्
इस
नित्यम्
नित्य
अनुतिष्ठन्ति
आचरण करते हैं
मानवा
मनुष्य
श्रद्धावन्त
श्रद्धा युक्त
अनसूयन्त
दोषदृष्टि न करने वाले
मुच्यन्ते
मुक्त हो जाते हैं
ते
वे
अपि
भी
कर्मभि
कर्मों से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो मनुष्य इस मेरे मत (उपदेश) का श्रद्धापूर्वक और बिना दोषदृष्टि के नित्य पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान अब वचन देते हैं कि जो भी इस उपदेश को श्रद्धा से मानेगा, वह कर्मबन्धन से मुक्त होगा। यह मार्ग सभी के लिए खुला है। The Lord now promises that whoever follows this teaching with faith will be freed from bondage. This path is open to all.
श्लोक का अर्थ / Meaning
जो श्रद्धा और अनसूया के साथ इस उपदेश का पालन करते हैं, वे कर्मों से मुक्त हो जाते हैं। Those who follow this teaching with faith and without envy become free from the bondage of actions.