श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 31

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 2 मिनट का पठन 105 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः | श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ||३१||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
ये
जो
मे
मेरे
मतम्
मत (उपदेश) को
इदम्
इस
नित्यम्
नित्य
अनुतिष्ठन्ति
आचरण करते हैं
मानवा
मनुष्य
श्रद्धावन्त
श्रद्धा युक्त
अनसूयन्त
दोषदृष्टि न करने वाले
मुच्यन्ते
मुक्त हो जाते हैं
ते
वे
अपि
भी
कर्मभि
कर्मों से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो मनुष्य इस मेरे मत (उपदेश) का श्रद्धापूर्वक और बिना दोषदृष्टि के नित्य पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान अब वचन देते हैं कि जो भी इस उपदेश को श्रद्धा से मानेगा, वह कर्मबन्धन से मुक्त होगा। यह मार्ग सभी के लिए खुला है। The Lord now promises that whoever follows this teaching with faith will be freed from bondage. This path is open to all.

श्लोक का अर्थ / Meaning

जो श्रद्धा और अनसूया के साथ इस उपदेश का पालन करते हैं, वे कर्मों से मुक्त हो जाते हैं। Those who follow this teaching with faith and without envy become free from the bondage of actions.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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