श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 32

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 2 मिनट का पठन 101 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् | सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ||३२||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
ये
जो
तु
लेकिन
एतत्
इस
अभ्यसूयन्त
दोष देते हुए
न
नहीं
अनुतिष्ठन्ति
पालन करते
मे
मेरे
मतम्
मत का
सर्वज्ञानविमूढान्
सब प्रकार के ज्ञान से रहित
तान्
उनको
विद्धि
जानो
नष्टान्
नष्ट
अचेतस
विवेकहीन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु जो लोग इस मेरे मत (उपदेश) में दोष निकालते हुए इसका पालन नहीं करते, उन सब ज्ञानों से रहित, नष्ट और अचेत (विवेकहीन) जानो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान उन लोगों की निन्दा करते हैं जो इस उपदेश की आलोचना करते हैं और उसे नहीं मानते। वे ज्ञान से वंचित रह जाते हैं। The Lord criticises those who reject this teaching with envy. They remain deprived of all knowledge and are lost.

श्लोक का अर्थ / Meaning

जो इस उपदेश में दोष देखते हैं और उसका पालन नहीं करते, वे ज्ञानहीन, नष्ट और विवेकहीन हैं। Those who carp at this teaching and do not follow it are deluded, lost, and senseless.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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श्लोक 32/43 74% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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