मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि | प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ||३३||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदसदृशम्
अनुरूप
चेष्टते
आचरण करता है
स्वस्याः
अपनी
प्रकृते
प्रकृति के
ज्ञानवान्
ज्ञानी
अपि
भी
प्रकृतिम्
प्रकृति को
यान्ति
प्राप्त होते हैं
भूतानि
प्राणी
निग्रह
दमन (बलपूर्वक रोकना)
किम्
क्या
करिष्यति
करेगा।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुरूप ही आचरण करता है। सब प्राणी प्रकृति के वश में हैं, बलपूर्वक दमन (रोकना) क्या करेगा?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान यहाँ वास्तविकता बताते हैं – मनुष्य अपनी प्रकृति (संस्कारों) के अनुसार कर्म करता है। यदि प्रकृति ही प्रबल है, तो बाहरी दमन व्यर्थ है। इसलिए प्रकृति को ऊपर उठाने के लिए साधना चाहिए। The Lord states the reality – a person acts according to their inherent nature. If nature is so powerful, external repression is futile. Therefore one must elevate one’s nature through practice.
श्लोक का अर्थ / Meaning
सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करते हैं, ज्ञानी भी। बलपूर्वक रोकने से कुछ नहीं होता। All beings act according to their nature, even the wise. What can repression do?