श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 34

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 3 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ | तयोर्न वशमागच्छेतौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ||३४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
इन्द्रियस्य इन्द्रियस्य
प्रत्येक इन्द्रिय के
अर्थे
विषय में
रागद्वेषौ
राग और द्वेष
व्यवस्थितौ
स्थित हैं
तयो
उन दोनों के
न
नहीं
वशम्
वश में
आगच्छेत्
आना चाहिए
तौ
वे
हि
निश्चय ही
अस्य
इस (साधक) के
परिपन्थिनौ
विघ्न डालने वाले (शत्रु) हैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग (आसक्ति) और द्वेष स्थित हैं। उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे इस (साधक) के शत्रु हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान साधक को सचेत करते हैं कि इन्द्रियों के विषयों में राग-द्वेष स्वाभाविक हैं, परन्तु उनके वश में होना ही बन्धन का कारण है। इनसे बचना ही साधना है। The Lord warns the seeker that attraction and aversion to sense objects are natural, but coming under their control leads to bondage. Avoiding them is the spiritual practice.

श्लोक का अर्थ / Meaning

प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष रहते हैं, इनके वश में होना बन्धन का कारण है। Attraction and aversion are attached to each sense object; coming under their control causes bondage.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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