श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 35

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 3 मिनट का पठन 119 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ||३५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
श्रेयान्
श्रेष्ठ है
स्वधर्म
अपना धर्म
विगुण
गुणहीन (त्रुटिपूर्ण) भी
परधर्मात
दूसरे के धर्म से
सुनिष्ठितात्
भली-भाँति पालन किए हुए
स्वधर्मे
अपने धर्म में
निधनम्
मृत्यु
श्रेय
कल्याणकारी
परधर्म
दूसरे का धर्म
भयावह
भय देने वाला।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अपना धर्म (कर्तव्य) यदि गुणहीन (त्रुटिपूर्ण) हो, तो भी दूसरे के सुनिष्ठित धर्म से श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म भयावह होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह गीता का एक प्रसिद्ध श्लोक है – अपने स्वभाव और अधिकार के अनुसार निर्धारित कर्तव्य (स्वधर्म) का पालन करना चाहिए, भले ही वह अपूर्ण रूप में हो। दूसरे के धर्म का पालन करना खतरनाक है। This is a famous verse – one should follow one’s own prescribed duty (svadharma) even if imperfectly. Following another’s duty is dangerous.

श्लोक का अर्थ / Meaning

अपना धर्म (कर्तव्य) त्रुटिपूर्ण होने पर भी दूसरे के सुंदर धर्म से श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मृत्यु कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म भय उत्पन्न करता है। One’s own duty, though defective, is superior to another’s duty well done. Death in one’s own duty is blessed; another’s duty is dangerous.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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