मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच | अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः | अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ||३६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदअर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
अथ
अब
केन
किसके द्वारा
प्रयुक्त
प्रेरित होकर
अयम्
यह
पापम्
पाप
चरति
करता है
पूरुष
मनुष्य
अनिच्छन्
न चाहता हुआ
अपि
भी
वार्ष्णेय
हे वार्ष्णेय (कृष्ण)
बलात्
बलपूर्वक
इव
मानो
नियोजित
लगाया गया।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अर्जुन बोले: हे वार्ष्णेय! फिर किसके द्वारा प्रेरित होकर यह मनुष्य पाप करता है, अनिच्छा से भी, मानो बलपूर्वक लगाया गया हो?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन अब एक गूढ़ प्रश्न पूछते हैं – यदि मनुष्य जानता है कि यह पाप है, फिर भी वह पाप क्यों करता है? इसका उत्तर आगे दिया जाएगा। Arjuna now asks a profound question – why does a person commit sin even against their will? The answer follows.
श्लोक का अर्थ / Meaning
अर्जुन पूछते हैं – हे कृष्ण, किसके प्रेरणा से मनुष्य अनिच्छा से भी पाप करता है? Arjuna asks – O Krishna, by what is a person impelled to commit sin, even unwillingly?