मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा | कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ||३९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदआवृतम्
ढका हुआ
ज्ञानम्
ज्ञान
एतेन
इसके द्वारा
ज्ञानिन
ज्ञानी का
नित्यवैरिणा
नित्य शत्रु
कामरूपेण
काम के रूप में
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
दुष्पूरेण
कभी न भरने वाली
अनलेन
अग्नि के समान
च
और।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कौन्तेय! ज्ञानी के इस नित्य शत्रु ने, जो काम के रूप में है और अग्नि के समान कभी न बुझने वाला है, ज्ञान को ढक रखा है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
काम को और स्पष्ट किया गया – यह ज्ञानी का भी नित्य शत्रु है, कभी तृप्त न होने वाला और अग्नि की तरह दहकता हुआ। Desire is further described – it is the eternal enemy of the wise, insatiable, and burning like fire.
श्लोक का अर्थ / Meaning
यह कामरूपी नित्य शत्रु, जो अतृप्त अग्नि के समान है, ज्ञानी के ज्ञान को ढक लेता है। This desire, the eternal enemy, insatiable like fire, covers the knowledge of the wise.