श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 40

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 3 मिनट का पठन 104 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते | एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ||४०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
मन
मन
बुद्धि
बुद्धि
अस्य
इस (काम) का
अधिष्ठानम्
स्थान (आश्रय)
उच्यते
कहा जाता है
एतै
इनके द्वारा
विमोहयति
मोहित करता है
एष
यह
ज्ञानम्
ज्ञान को
आवृत्य
ढककर
देहिनम्
शरीरधारी को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि – ये इस (काम) के स्थान (आधार) कहे जाते हैं। इनके द्वारा यह (काम) ज्ञान को ढककर शरीरधारी (जीव) को मोहित करता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान अब काम के निवास स्थान बताते हैं – इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि। यहीं से यह ज्ञान को ढकता है और जीव को मोहित करता है। The Lord now states the abode of desire – senses, mind, and intellect. From there it covers knowledge and deludes the soul.

श्लोक का अर्थ / Meaning

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि – ये काम के आश्रय हैं। इनके द्वारा काम ज्ञान को ढककर जीव को मोहित करता है। The senses, mind, and intellect are the seats of desire. Through them, desire covers knowledge and deludes the soul.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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