मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ | पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ||४१||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदतस्मात्
इसलिए
त्वम्
तू
इन्द्रियाणि
इन्द्रियों को
आदौ
पहले
नियम्य
वश में करके
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ
पाप्मानम्
पापी को
प्रजहि
त्याग दे
हि
निश्चय ही
एनम्
इस (काम) को
ज्ञानविज्ञाननाशनम्
ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाला।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! पहले इन्द्रियों को वश में करके, इस ज्ञान-विज्ञान का नाश करने वाले पापी (काम) को नष्ट कर डाल।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान अब व्यावहारिक उपदेश देते हैं – पहले इन्द्रियों पर नियंत्रण करो, फिर काम रूपी शत्रु को मारो। यही साधना का क्रम है। The Lord now gives practical advice – first control the senses, then destroy this enemy called desire. This is the sequence of spiritual practice.
श्लोक का अर्थ / Meaning
इसलिए पहले इन्द्रियों को वश में करके, ज्ञान-विज्ञान का नाश करने वाले काम को नष्ट कर। Therefore, first control the senses and then slay this desire, which destroys knowledge and discrimination.