श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 6

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 2 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् | इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ||६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
कर्मेन्द्रियाणि
कर्मेन्द्रियों को
संयम्य
रोककर
य
जो
आस्ते
बैठा है
मनसा
मन से
स्मरन्
स्मरण करता हुआ
इन्द्रियार्थान्
इन्द्रियों के विषयों को
विमूढात्मा
मूढ़ बुद्धि वाला
मिथ्याचार
ढोंगी, पाखण्डी
स
वह
उच्यते
कहलाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो कर्मेन्द्रियों को तो रोक लेता है, किन्तु मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मूढ़ात्मा (धोखेबाज) मिथ्याचारी कहलाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

बाहरी त्याग का कोई मूल्य नहीं यदि मन भोगों में लगा हो। सच्चा संन्यासी वह है जिसने मन को भी वश में किया हो। External renunciation is worthless if the mind is still attached to sense objects. True renunciation is when the mind is also controlled.

श्लोक का अर्थ / Meaning

बाहर से संयमी दिखना पर भीतर से विषयों में लिप्त रहना मिथ्याचार है। Outward restraint with inner attachment is hypocrisy.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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