श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 7

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 3 मिनट का पठन 116 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन | कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ||७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
य
जो
तु
लेकिन
इन्द्रियाणि
इन्द्रियों को
मनसा
मन द्वारा
नियम्य
नियंत्रित करके
आरभते
आरम्भ करता है
अर्जुन
हे अर्जुन
कर्मेन्द्रियै
कर्मेन्द्रियों द्वारा
कर्मयोगम्
कर्मयोग को
असक्तः
आसक्ति रहित
स
वह
विशिष्यते
श्रेष्ठ है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु हे अर्जुन! जो मन द्वारा इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति रहित होकर कर्मेन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अब भगवान श्रेष्ठ साधक का लक्षण बताते हैं – जो मन से इन्द्रियों को नियंत्रित करता है और फिर भी कर्म करता है, लेकिन आसक्ति रहित होकर। यही कर्मयोगी है। Now the Lord describes the ideal practitioner: one who controls the senses with the mind, yet performs action without attachment. This is the true karma yogi.

श्लोक का अर्थ / Meaning

मन से इन्द्रियों को नियंत्रित करके, बिना आसक्ति के कर्म करना ही सच्चा कर्मयोग है। Performing action without attachment while controlling the senses with the mind is true karma yoga.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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