मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः | शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ||८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदनियतम्
नियत (शास्त्र-विहित)
कुरु
कर
कर्म
कर्म
त्वम्
तू
कर्म
कर्म
ज्याय
श्रेष्ठ है
हि
निश्चय ही
अकर्मण
अकर्म से
शरीरयात्रा
शरीर-निर्वाह
अपि
भी
च
और
ते
तेरा
न
नहीं
प्रसिध्येत्
सिद्ध होगा
अकर्मण
कर्म न करने से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
तू नियत (शास्त्र-विहित) कर्म कर, क्योंकि कर्म, अकर्म से श्रेष्ठ है और अकर्म (बिना कर्म किए) तो तेरे शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान अब सीधा आदेश देते हैं – अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करना (अकर्म) न केवल अश्रेष्ठ है, बल्कि व्यावहारिक रूप से असम्भव भी है। The Lord now gives a direct command: perform your prescribed duty, because inaction is not only inferior but also practically impossible – even bodily maintenance requires action.
श्लोक का अर्थ / Meaning
शास्त्र-विहित कर्म करना चाहिए, क्योंकि बिना कर्म के जीवन निर्वाह भी नहीं हो सकता। One must perform prescribed duties, because even bodily maintenance is impossible without action.