श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 8

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 3 मिनट का पठन 126 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः | शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ||८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
नियतम्
नियत (शास्त्र-विहित)
कुरु
कर
कर्म
कर्म
त्वम्
तू
कर्म
कर्म
ज्याय
श्रेष्ठ है
हि
निश्चय ही
अकर्मण
अकर्म से
शरीरयात्रा
शरीर-निर्वाह
अपि
भी
च
और
ते
तेरा
न
नहीं
प्रसिध्येत्
सिद्ध होगा
अकर्मण
कर्म न करने से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

तू नियत (शास्त्र-विहित) कर्म कर, क्योंकि कर्म, अकर्म से श्रेष्ठ है और अकर्म (बिना कर्म किए) तो तेरे शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान अब सीधा आदेश देते हैं – अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करना (अकर्म) न केवल अश्रेष्ठ है, बल्कि व्यावहारिक रूप से असम्भव भी है। The Lord now gives a direct command: perform your prescribed duty, because inaction is not only inferior but also practically impossible – even bodily maintenance requires action.

श्लोक का अर्थ / Meaning

शास्त्र-विहित कर्म करना चाहिए, क्योंकि बिना कर्म के जीवन निर्वाह भी नहीं हो सकता। One must perform prescribed duties, because even bodily maintenance is impossible without action.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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