श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 9

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 3 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः | तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ||९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
यज्ञार्थात्
यज्ञ के लिए किए गए कर्म से
अन्यत्र
भिन्न
लोक
संसार
अयम्
यह
कर्मबन्धन
कर्मों से बँधा हुआ है
तदर्थम्
उसके लिए (यज्ञ के लिए)
कर्म
कर्म
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
मुक्तसङ्ग
आसक्ति रहित होकर
समाचर
भली-भाँति कर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यज्ञ के लिए किए गए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्मों से यह संसार (मनुष्य) बँध जाता है। अतः हे कुन्तीपुत्र! तू आसक्ति रहित होकर उस (यज्ञ) के लिए कर्म कर।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान कर्म-बन्धन से मुक्ति का रहस्य बताते हैं – कर्म को यज्ञ (ईश्वरार्पण) की भावना से करो। तभी वह बन्धनकारी नहीं होता। यह कर्मयोग का सार है। The Lord reveals the secret to freedom from bondage: perform work as a sacrifice (offering to the Lord). Only then does action not bind. This is the essence of Karma Yoga.

श्लोक का अर्थ / Meaning

यज्ञ के भाव से किया गया कर्म बन्धन नहीं करता, अन्यथा सांसारिक कर्म बाँधते हैं। Work done as a sacrifice does not bind; otherwise, worldly actions bind.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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