मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः | बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ||१०||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदवीतरागभयक्रोधाः
राग, भय और क्रोध से रहित
मन्मयाः
मुझमें तन्मय
माम्
मेरी
उपाश्रिताः
शरण में
बहवः
अनेक
ज्ञानतपसा
ज्ञानरूपी तप से
पूताः
पवित्र हुए
मद्भावम्
मेरे भाव (स्वरूप) को
आगताः
प्राप्त हुए।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
राग, भय और क्रोध से रहित, मुझमें तन्मय, मेरी शरण में रहकर, ज्ञानरूपी तप से पवित्र हुए अनेक लोग मेरे भाव (स्वरूप) को प्राप्त हुए हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कृष्ण उदाहरण देते हैं कि अनेक भक्त पहले भी इस मार्ग से मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं। शर्तें हैं – राग, भय, क्रोध से मुक्ति, ईश्वर में तन्मयता, और ज्ञानरूपी तप से पवित्रता।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
राग, भय और क्रोध से मुक्त, मुझमें तन्मय, मेरी शरण में रहकर, ज्ञानरूपी तप से पवित्र हुए अनेक लोग मेरे भाव (स्वरूप) को प्राप्त हुए हैं। Freed from attachment, fear, and anger, absorbed in Me, taking refuge in Me, purified by the fire of knowledge, many have attained My Being.
मार्ग की सत्यता / Validity of the Path
यह श्लोक बताता है कि यह मार्ग कोई नया नहीं, बल्कि सिद्ध परम्परा है। अनेक साधक पहले भी इस मार्ग से मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं। This verse validates the path by citing the example of many previous seekers who attained liberation through it.