मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् | मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||११||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदये
जो
यथा
जैसे
माम्
मुझको
प्रपद्यन्ते
भजते हैं
तान्
उनको
तथा
वैसे
एव
ही
भजामि
भजता हूँ
अहम्
मैं
मम
मेरे
वर्त्म
मार्ग का
अनुवर्तन्ते
अनुसरण करते हैं
मनुष्याः
मनुष्य
पार्थ
हे पार्थ
सर्वशः
सब प्रकार से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं उनको उसी प्रकार भजता हूँ। सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक ईश्वर की सर्वसमावेशकता को दर्शाता है। विभिन्न साधक विभिन्न भावों से ईश्वर की उपासना करते हैं, और ईश्वर उन्हें उनके भाव के अनुरूप फल प्रदान करते हैं। कोई भी सच्चा मार्ग ईश्वर से अलग नहीं है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पार्थ! जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं उनको उसी प्रकार भजता हूँ। सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। In whatever way men approach Me, even so do I reward them. My path do men tread in all ways, O Arjuna.
ईश्वर की न्यायपूर्णता / Divine Justice
यह श्लोक ईश्वर की न्यायपूर्णता और सर्वसमावेशकता को दर्शाता है। ईश्वर किसी भक्त को उसकी साधना के अनुरूप फल देते हैं, और सभी मार्ग अंततः उन्हीं की ओर ले जाते हैं। This verse reveals the impartiality of God and the unity of all spiritual paths.