मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः | क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ||१२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदकाङ्क्षन्तः
इच्छा करते हुए
कर्मणाम्
कर्मों की
सिद्धिम्
सिद्धि (सफलता)
यजन्ते
पूजते हैं
इह
इस लोक में
देवताः
देवताओं को
क्षिप्रम्
शीघ्र
हि
निश्चय ही
मानुषे
मनुष्यों के
लोके
लोक में
सिद्धिः
सिद्धि
भवति
होती है
कर्मजा
कर्मों से उत्पन्न।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस लोक में (सामान्य मनुष्य) कर्मों की सिद्धि (सफलता) की इच्छा से देवताओं को पूजते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों से उत्पन्न सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कृष्ण यहाँ सांसारिक लोगों की प्रवृत्ति बताते हैं। वे शीघ्र फल चाहते हैं, इसलिए देवताओं की पूजा करते हैं। यह सांसारिक कर्मकाण्ड का मार्ग है, जो शीघ्र फल देता है, किन्तु अस्थायी है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस लोक में (सामान्य मनुष्य) कर्मों की सिद्धि की इच्छा से देवताओं को पूजते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों से उत्पन्न सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है। Those who long for success in action in this world sacrifice to the gods; for success is quickly attained by men through action.
सांसारिक बुद्धि / Worldly Intelligence
यह श्लोक उन लोगों की मानसिकता को दर्शाता है जो शीघ्र फल चाहते हैं। वे देवताओं की उपासना करके सांसारिक सफलता प्राप्त करते हैं, पर यह सफलता अस्थायी होती है। This verse contrasts the quick but temporary results of worldly worship with the eternal results of devotion to the Supreme.