मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः | त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ||९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
18 पदजन्म
जन्म
कर्म
कर्म
च
और
मे
मेरे
दिव्यम्
दिव्य
एवम्
इस प्रकार
यः
जो
वेत्ति
जानता है
तत्त्वतः
तत्त्व से
त्यक्त्वा
त्यागकर
देहम्
शरीर को
पुनर्जन्म
पुनर्जन्म
न
नहीं
एति
पाता
माम्
मुझको
एति
प्राप्त होता है
सः
वह
अर्जुन
हे अर्जुन।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे अर्जुन! जो मेरे दिव्य जन्म और कर्मों को इस प्रकार तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता, बल्कि मुझको ही प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ईश्वर के दिव्य जन्म और कर्मों को यथार्थ रूप से जानने का फल – मोक्ष। जो यह समझ लेता है कि कृष्ण का जन्म और कर्म साधारण नहीं, बल्कि दिव्य हैं, वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! जो मेरे दिव्य जन्म और कर्मों को इस प्रकार तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता, बल्कि मुझको ही प्राप्त होता है। One who truly knows My divine birth and actions, O Arjuna, is not born again after leaving the body; he attains Me.
ज्ञान का फल / Fruit of Knowledge
यह श्लोक ईश्वर के दिव्य स्वरूप को जानने के फल को स्पष्ट करता है। यह ज्ञान साधक को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर मोक्ष दिलाता है। This verse reveals the liberating power of understanding the divine nature of the Lord's appearance and activities.