मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा | इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ||१४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदन
नहीं
माम्
मुझको
कर्माणि
कर्म
लिम्पन्ति
लिप्त करते
न
नहीं
मे
मेरी
कर्मफले
कर्मफल में
स्पृहा
इच्छा
इति
इस प्रकार
माम्
मुझको
यः
जो
अभिजानाति
जानता है
कर्मभिः
कर्मों से
न
नहीं
सः
वह
बध्यते
बंधता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, और न ही मेरी कर्मफल में स्पृहा (इच्छा) है। इस प्रकार जो मुझे जान लेता है, वह कर्मों से नहीं बंधता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ईश्वर की विशेषता – वे कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होते, क्योंकि उनकी फल में आसक्ति नहीं। और जो साधक ईश्वर के इस स्वरूप को जान लेता है, वह भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, और न ही मेरी कर्मफल में कोई इच्छा है। इस प्रकार जो मुझे जान लेता है, वह कर्मों से नहीं बंधता। Actions do not taint Me, nor do I have a desire for the fruit of actions. He who knows Me thus is not bound by actions.
अलिप्तता / Non-attachment
यह श्लोक ईश्वर की अलिप्तता और फलासक्ति से मुक्ति का आदर्श प्रस्तुत करता है। इस आदर्श को जानने वाला साधक भी कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है। This verse presents the ideal of unattached action, which, when understood, liberates one from the bondage of karma.