मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः | तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||१६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदकिम्
क्या
कर्म
कर्म
किम्
क्या
अकर्म
अकर्म
इति
इस प्रकार
कवयः
विद्वान
अपि
भी
अत्र
इस विषय में
मोहिताः
मोहित हैं
तत्
वह
ते
तुमसे
कर्म
कर्म
प्रवक्ष्यामि
भलीभाँति कहूँगा
यत्
जिसको
ज्ञात्वा
जानकर
मोक्ष्यसे
मुक्त हो जाओगे
अशुभात्
अशुभ (बन्धन) से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कर्म क्या है और अकर्म क्या है – इस विषय में विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म (तत्त्व) मैं तुमसे कहूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार-बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कृष्ण एक गूढ़ विषय की ओर संकेत करते हैं – कर्म और अकर्म का रहस्य। साधारण बुद्धि से यह समझना कठिन है कि कर्म क्या है, अकर्म क्या है, और विकर्म क्या है। यह ज्ञान ही बन्धनमुक्ति का कारण है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कर्म क्या है और अकर्म क्या है – इस विषय में विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्म (तत्त्व) मैं तुमसे कहूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार-बन्धन) से मुक्त हो जाओगे। What is action? What is inaction? Even the wise are confused about this. Therefore, I shall teach you the nature of action and inaction, by knowing which you will be liberated from the evil of Samsara.
गूढ़ विषय / Profound Subject
यह श्लोक कर्म के गूढ़तम रहस्य की ओर संकेत करता है। केवल क्रिया करना कर्म नहीं है, और निष्क्रियता अकर्म नहीं है। इस गहरे रहस्य को समझना ही मुक्ति का मार्ग है। This verse introduces the profound mystery of action and inaction, the understanding of which leads to liberation.