मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः | अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ||१७||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदकर्मणः
कर्म के स्वरूप को
हि
निश्चय ही
अपि
भी
बोद्धव्यम्
जानना चाहिए
बोद्धव्यम्
जानना चाहिए
च
और
विकर्मणः
विकर्म (निषिद्ध कर्म) को
अकर्मणः
अकर्म को
च
और
बोद्धव्यम्
जानना चाहिए
गहना
गहन है
कर्मणः
कर्म की
गतिः
गति।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
निश्चय ही कर्म के स्वरूप को जानना चाहिए, और विकर्म (निषिद्ध कर्म) को जानना चाहिए, और अकर्म को भी जानना चाहिए। कर्म की गति गहन है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कर्म के तीन भेद – कर्म (शास्त्र-विहित), विकर्म (निषिद्ध), और अकर्म (क्रियाशून्यता)। इन तीनों के स्वरूप को समझना आवश्यक है, क्योंकि कर्म का मार्ग अत्यन्त गूढ़ है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
निश्चय ही कर्म के स्वरूप को जानना चाहिए, और विकर्म (निषिद्ध कर्म) को जानना चाहिए, और अकर्म को भी जानना चाहिए। कर्म की गति गहन है। The true nature of action should be known, as well as that of forbidden action, and of inaction; the nature of action is hard to understand.
त्रिविध कर्म / Threefold Action
यह श्लोक कर्म के तीन पहलुओं – विहित कर्म, निषिद्ध कर्म, और अकर्म – के ज्ञान की आवश्यकता बताता है। इन तीनों को समझे बिना कर्मयोग का रहस्य नहीं समझा जा सकता। This verse highlights the need to understand the threefold nature of action to grasp the mystery of karma.