मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः | स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ||१८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदकर्मणि
कर्म में
अकर्म
अकर्म
यः
जो
पश्येत्
देखता है
अकर्मणि
अकर्म में
च
और
कर्म
कर्म
यः
जो
सः
वह
बुद्धिमान्
बुद्धिमान
मनुष्येषु
मनुष्यों में
सः
वह
युक्तः
योगी
कृत्स्नकर्मकृत्
सम्पूर्ण कर्म करने वाला।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है। वह युक्त (योगी) और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह कर्म-अकर्म के रहस्य का सूत्र है। कर्म करते हुए भी अकर्म की स्थिति – अर्थात कर्तापन के अभिमान से मुक्त रहना, और अकर्म में भी कर्म – अर्थात निष्क्रिय रहते हुए भी कर्तव्य की भावना बनाए रखना। ऐसा व्यक्ति ही सच्चा ज्ञानी और योगी है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है। वह योगी और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है। He who sees inaction in action and action in inaction, he is wise among men; he is a yogi and performer of all actions.
कर्मयोग का रहस्य / Secret of Karma Yoga
यह श्लोक कर्मयोग के गूढ़तम रहस्य को प्रकट करता है। कर्तापन के अभिमान से मुक्त होकर कर्म करना ही कर्म में अकर्म देखना है। और निष्क्रिय रहते हुए भी कर्तव्यबोध बनाए रखना ही अकर्म में कर्म है। This verse reveals the deepest secret of Karma Yoga – performing action without ego, and remaining inactive within while engaged in action.