मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः | कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ||२०||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदत्यक्त्वा
त्यागकर
कर्मफलासङ्गम्
कर्मफल की आसक्ति को
नित्यतृप्तः
नित्य तृप्त
निराश्रयः
निराश्रय (किसी आश्रय का आश्रित न होना)
कर्मणि
कर्म में
अभिप्रवृत्तः
लगा हुआ
अपि
भी
न
नहीं
एव
ही
किञ्चित्
कुछ भी
करोति
करता
सः
वह।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर, नित्य तृप्त और निराश्रय (किसी आश्रय का आश्रित न होकर) वह कर्मों में लगा हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ज्ञानी का विलक्षण व्यवहार – वह कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता, क्योंकि उसका कर्तापन का अभिमान समाप्त हो चुका है। वह फलासक्ति से मुक्त, आत्म-संतुष्ट और स्वतंत्र है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर, नित्य तृप्त और निराश्रय (किसी आश्रय का आश्रित न होकर) वह कर्मों में लगा हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता। Having abandoned attachment to the fruits of action, ever content, depending on nothing, he does not do anything even while being engaged in activity.
अकर्ता भाव / State of Non-doership
यह श्लोक ज्ञानी की अद्वितीय स्थिति का वर्णन करता है। बाहर से कर्म करते हुए भी वह आन्तरिक रूप से अकर्ता रहता है, क्योंकि उसका कर्तापन का अभिमान समाप्त हो चुका है। This verse describes the unique state of the enlightened one who, though engaged in action, remains internally actionless.