मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः | समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ||२२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदयदृच्छालाभसन्तुष्टः
यदृच्छा (बिना प्रयास) से प्राप्त लाभ में सन्तुष्ट
द्वन्द्वातीतः
द्वन्द्वों से रहित
विमत्सरः
मत्सर (ईर्ष्या) से रहित
समः
समान
सिद्धौ
सफलता में
असिद्धौ
असफलता में
च
और
कृत्वा
करके
अपि
भी
न
नहीं
निबध्यते
बंधता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
बिना प्रयास (अपने आप) प्राप्त हुए लाभ में सन्तुष्ट, द्वन्द्वों से अतीत, ईर्ष्या से रहित, सफलता और असफलता में समान – वह कर्म करके भी नहीं बंधता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ज्ञानी के और लक्षण – वह जो भी बिना माँगे मिल जाता है, उसी में संतुष्ट रहता है। वह द्वन्द्वों (सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी आदि) से परे है। उसमें ईर्ष्या नहीं है। वह सफलता-असफलता में समान रहता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी बन्धनमुक्त रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
बिना प्रयास प्राप्त हुए लाभ में सन्तुष्ट, द्वन्द्वों से अतीत, ईर्ष्या से रहित, सफलता और असफलता में समान – वह कर्म करके भी नहीं बंधता। Content with what comes without effort, free from the pairs of opposites and envy, even-minded in success and failure, he acts yet is not bound.
संतोष और समत्व / Contentment and Equanimity
यह श्लोक ज्ञानी के जीवन-दर्शन को प्रस्तुत करता है – संतोष, समत्व, और सफलता-असफलता में समान भाव। यही कर्मबन्धन से मुक्ति का मार्ग है। This verse presents the life-philosophy of the wise – contentment, equanimity, and indifference to success and failure.