मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् | ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ||२४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदब्रह्म
ब्रह्म
अर्पणम्
अर्पण करने की क्रिया
ब्रह्म
ब्रह्म
हविः
हवि (आहुति)
ब्रह्माग्नौ
ब्रह्मरूपी अग्नि में
ब्रह्मणा
ब्रह्म द्वारा
हुतम्
हवन किया गया
ब्रह्म
ब्रह्म
एव
ही
तेन
उसके द्वारा
गन्तव्यम्
प्राप्त करने योग्य
ब्रह्मकर्मसमाधिना
ब्रह्म में कर्म की समाधि (एकता) रखने वाले।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अर्पण करने की क्रिया ब्रह्म है, हवि (आहुति) ब्रह्म है, ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्म द्वारा हवन किया गया है – इस प्रकार ब्रह्म में कर्म की समाधि (एकता) रखने वाले उस (पुरुष) द्वारा ब्रह्म ही प्राप्त करने योग्य है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक अद्वैत भाव से कर्म करने का सर्वोच्च स्तर है। कर्ता, कर्म, क्रिया, साधन, फल – सब ब्रह्म ही हैं। ऐसी भावना से कर्म करने वाला ब्रह्म को ही प्राप्त होता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अर्पण करने की क्रिया ब्रह्म है, हवि (आहुति) ब्रह्म है, ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्म द्वारा हवन किया गया है – इस प्रकार ब्रह्म में कर्म की समाधि रखने वाले उस पुरुष द्वारा ब्रह्म ही प्राप्त करने योग्य है। Brahman is the oblation; Brahman is the melted butter; by Brahman is the oblation poured into the fire of Brahman; Brahman indeed shall be attained by one who always sees Brahman in action.
अद्वैत भाव / Non-dual Vision
यह श्लोक कर्मयोग की चरम सीमा है – जहाँ कर्ता, कर्म और लक्ष्य सब एक ही ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं। यह अद्वैत भाव से किए गए कर्म का वर्णन है। This verse represents the pinnacle of Karma Yoga, where the doer, action, and goal all merge into the one Brahman.