श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 25

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 3 मिनट का पठन 128 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते | ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ||२५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
दैवम्
देवताओं सम्बन्धी
एव
ही
अपरे
अन्य
यज्ञम्
यज्ञ को
योगिनः
योगी
पर्युपासते
उपासना करते हैं
ब्रह्माग्नौ
ब्रह्मरूपी अग्नि में
अपरे
अन्य
यज्ञम्
यज्ञ को
यज्ञेन
यज्ञ द्वारा
एव
ही
उपजुह्वति
हवन करते हैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

कितने ही योगी देवताओं के यज्ञ की उपासना करते हैं, और दूसरे (अन्य योगी) ब्रह्मरूपी अग्नि में यज्ञ द्वारा ही यज्ञ का हवन करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यहाँ यज्ञ के दो स्तर बताए गए हैं – बाह्य यज्ञ (देवताओं की उपासना) और आन्तरिक यज्ञ (आत्म-साक्षात्कार के लिए किए गए साधना-यज्ञ)। दूसरे प्रकार के योगी साधना के साधनों (यज्ञ) को ही ब्रह्म में हवन कर देते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कितने ही योगी देवताओं के यज्ञ की उपासना करते हैं, और दूसरे योगी ब्रह्मरूपी अग्नि में यज्ञ द्वारा ही यज्ञ का हवन करते हैं। Some yogis perform sacrifice to the gods alone; while others, who have realized the Self, offer the Self as sacrifice in the fire of Brahman alone.

यज्ञ का विकास / Evolution of Sacrifice

यह श्लोक यज्ञ की अवधारणा के विकास को दर्शाता है – बाह्य कर्मकाण्ड से आन्तरिक आत्म-साधना तक। दूसरे प्रकार के योगी अपनी सम्पूर्ण साधना को ही ब्रह्म को अर्पित कर देते हैं। This verse shows the progression from external ritualistic sacrifice to internal spiritual offering.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 25 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 25/42 60% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!