मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति | शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ||२६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदश्रोत्रादीनि
श्रोत्र आदि
इन्द्रियाणि
इन्द्रियों को
अन्ये
अन्य (योगी)
संयमाग्निषु
संयमरूपी अग्नि में
जुह्वति
हवन करते हैं
शब्दादीन्
शब्द आदि
विषयान्
विषयों को
अन्ये
अन्य
इन्द्रियाग्निषु
इन्द्रियरूपी अग्नि में
जुह्वति
हवन करते हैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कितने ही (योगी) श्रोत्र आदि इन्द्रियों को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं, और अन्य (योगी) शब्द आदि विषयों को इन्द्रियरूपी अग्नि में हवन करते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ इन्द्रिय-संयम के दो रूप बताए गए हैं – एक में इन्द्रियों की क्रियाशीलता को ही रोककर संयम में हवन किया जाता है; दूसरे में विषयों (शब्द, स्पर्श आदि) को इन्द्रियों के माध्यम से ही भस्म कर दिया जाता है, अर्थात विषयों के प्रति आसक्ति न रखकर उनका उपभोग किया जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कितने ही योगी श्रोत्र आदि इन्द्रियों को संयमरूपी अग्नि में हवन करते हैं, और अन्य योगी शब्द आदि विषयों को इन्द्रियरूपी अग्नि में हवन करते हैं। Some again offer the organ of hearing and other senses as a sacrifice in the fire of restraint; others offer sound and other objects of the senses as a sacrifice in the fire of the senses.
इन्द्रिय-निग्रह के मार्ग / Paths of Sense Control
यह श्लोक इन्द्रियों पर नियंत्रण के दो मार्ग बताता है – एक में इन्द्रियों को विषयों से हटाकर संयम में स्थिर किया जाता है, दूसरे में विषयों का उपभोग आसक्ति रहित होकर किया जाता है। This verse describes two paths of sense control – complete withdrawal of senses, and detached enjoyment of sense objects.