श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 28

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 4 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे | स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ||२८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
द्रव्ययज्ञाः
द्रव्य-यज्ञ (द्रव्य के दान के यज्ञ)
तपोयज्ञाः
तपो-यज्ञ
योगयज्ञाः
योग-यज्ञ
तथा
इस प्रकार
अपरे
अन्य
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः
स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ
च
और
यतयः
यत्नशील
संशितव्रताः
दृढ़ व्रत वाले।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

कितने ही द्रव्य-यज्ञ, तपो-यज्ञ, योग-यज्ञ करते हैं, और अन्य संयमी, दृढ़ व्रत वाले साधक स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यहाँ विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन है – द्रव्ययज्ञ (दान), तपोयज्ञ (तपस्या), योगयज्ञ (अष्टांग योग), स्वाध्याययज्ञ (शास्त्रों का अध्ययन), और ज्ञानयज्ञ (आत्म-ज्ञान की प्राप्ति)। सभी साधक अपनी योग्यता और अधिकार के अनुसार इनमें से किसी न किसी मार्ग को अपनाते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कितने ही द्रव्य-यज्ञ, तपो-यज्ञ, योग-यज्ञ करते हैं, और अन्य संयमी, दृढ़ व्रत वाले साधक स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ करते हैं। Others again offer wealth, austerity, and Yoga as sacrifice, while ascetics of self-restraint and rigid vows offer the study of scriptures and knowledge as sacrifice.

यज्ञ के विविध रूप / Various Forms of Sacrifice

यह श्लोक यज्ञ की व्यापक अवधारणा को प्रस्तुत करता है। कोई भी कार्य, जो ईश्वर को समर्पित भाव से किया जाता है, यज्ञ बन सकता है – चाहे वह दान हो, तप हो, योग हो, या शास्त्राध्ययन। This verse presents the broad concept of sacrifice – any action done with a spirit of dedication becomes a yajna.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 28 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 28/42 67% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!