मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे | स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ||२८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदद्रव्ययज्ञाः
द्रव्य-यज्ञ (द्रव्य के दान के यज्ञ)
तपोयज्ञाः
तपो-यज्ञ
योगयज्ञाः
योग-यज्ञ
तथा
इस प्रकार
अपरे
अन्य
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः
स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ
च
और
यतयः
यत्नशील
संशितव्रताः
दृढ़ व्रत वाले।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कितने ही द्रव्य-यज्ञ, तपो-यज्ञ, योग-यज्ञ करते हैं, और अन्य संयमी, दृढ़ व्रत वाले साधक स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ करते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन है – द्रव्ययज्ञ (दान), तपोयज्ञ (तपस्या), योगयज्ञ (अष्टांग योग), स्वाध्याययज्ञ (शास्त्रों का अध्ययन), और ज्ञानयज्ञ (आत्म-ज्ञान की प्राप्ति)। सभी साधक अपनी योग्यता और अधिकार के अनुसार इनमें से किसी न किसी मार्ग को अपनाते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कितने ही द्रव्य-यज्ञ, तपो-यज्ञ, योग-यज्ञ करते हैं, और अन्य संयमी, दृढ़ व्रत वाले साधक स्वाध्याय और ज्ञान-यज्ञ करते हैं। Others again offer wealth, austerity, and Yoga as sacrifice, while ascetics of self-restraint and rigid vows offer the study of scriptures and knowledge as sacrifice.
यज्ञ के विविध रूप / Various Forms of Sacrifice
यह श्लोक यज्ञ की व्यापक अवधारणा को प्रस्तुत करता है। कोई भी कार्य, जो ईश्वर को समर्पित भाव से किया जाता है, यज्ञ बन सकता है – चाहे वह दान हो, तप हो, योग हो, या शास्त्राध्ययन। This verse presents the broad concept of sacrifice – any action done with a spirit of dedication becomes a yajna.