मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे | प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः | अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ||२९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदअपाने
अपान में
जुह्वति
हवन करते हैं
प्राणम्
प्राण को
प्राणे
प्राण में
अपानम्
अपान को
तथा
इस प्रकार
अपरे
अन्य
प्राणापानगती
प्राण और अपान की गतियों को
रुद्ध्वा
रोककर
प्राणायामपरायणाः
प्राणायाम में तत्पर
अपरे
अन्य
नियताहाराः
नियमित आहार वाले
प्राणान्
प्राणों को
प्राणेषु
प्राणों में
जुह्वति
हवन करते हैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कितने ही (योगी) अपान में प्राण को हवन करते हैं और प्राण में अपान को हवन करते हैं। प्राण और अपान की गति को रोककर, प्राणायाम में तत्पर रहने वाले अन्य योगी हैं। अन्य नियमित आहार वाले योगी प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ प्राणायाम और प्राण-विद्या से सम्बन्धित यज्ञों का वर्णन है। कुछ योगी प्राण और अपान की क्रियाओं को संतुलित करते हैं, कुछ प्राणायाम के माध्यम से प्राणों को रोकते हैं, और कुछ आहार नियंत्रण के द्वारा प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं (अर्थात प्राण-शक्ति का आन्तरिकीकरण करते हैं)।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कितने ही योगी अपान में प्राण को हवन करते हैं और प्राण में अपान को हवन करते हैं। प्राण और अपान की गति को रोककर, प्राणायाम में तत्पर रहने वाले अन्य योगी हैं। अन्य नियमित आहार वाले योगी प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। Others offer as sacrifice the outgoing breath into the incoming, and the incoming into the outgoing. Others who regulate their diet offer life-breaths in each life-breath.
प्राण-विद्या / Science of Prana
यह श्लोक योग की सूक्ष्म प्रक्रियाओं – प्राणायाम और प्राण-नियंत्रण – को यज्ञ के रूप में वर्णित करता है। यह दर्शाता है कि योग-साधना भी एक प्रकार का आन्तरिक यज्ञ है। This verse describes the subtle yogic practices of pranayama and breath control as forms of internal sacrifice.