मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः | यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ||३०||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदसर्वे
सभी
अपि
भी
एते
ये
यज्ञविदः
यज्ञ के ज्ञाता
यज्ञक्षपितकल्मषाः
यज्ञ द्वारा क्षय किए हुए पाप वाले
यज्ञशिष्टामृतभुजः
यज्ञ से बचे हुए अमृत को भोगने वाले
यान्ति
जाते हैं
ब्रह्म
ब्रह्म
सनातनम्
सनातन।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
ये सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं, यज्ञ द्वारा क्षय किए हुए पाप वाले हैं, और यज्ञ से बचे हुए अमृत को भोगने वाले हैं – वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सभी प्रकार के यज्ञ करने वालों का लक्ष्य एक ही है – ब्रह्म की प्राप्ति। वे यज्ञ के ज्ञाता हैं, यज्ञ से उनके पाप नष्ट हो जाते हैं, और वे यज्ञ के शेष (प्रसाद) का भोग करते हुए अंततः सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
ये सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं, यज्ञ द्वारा क्षय किए हुए पाप वाले हैं, और यज्ञ से बचे हुए अमृत को भोगने वाले हैं – वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। All these are knowers of sacrifice, whose sins are destroyed through sacrifice. They, who enjoy the nectar of the remnants of sacrifice, go to the eternal Brahman.
एक लक्ष्य / One Goal
यह श्लोक बताता है कि चाहे यज्ञ का स्वरूप कोई भी हो – बाह्य या आन्तरिक – सभी का लक्ष्य एक ही है – ब्रह्म की प्राप्ति। यह विविधता में एकता का सिद्धांत है। This verse establishes the unity underlying the diversity of spiritual paths – all lead to the same goal of Brahman.