श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 31

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 6 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
यज्ञशिष्ट
यज्ञ से बचे हुए
अमृत
अमृत (प्रसाद) को
भुज
भोगने वाले
यान्ति
जाते हैं
ब्रह्म
ब्रह्म को
सनातनम्
सनातन
न
नहीं
अयम्
यह
लोक
लोक
अस्ति
है
अयज्ञस्य
यज्ञ न करने वाले के लिए
कुत
कहाँ
अन्य
अन्य (लोक)
कुरुसत्तम
हे कुरुश्रेष्ठ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यज्ञ से बचे हुए अमृत (प्रसाद) को भोगने वाले योगीजन सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ न करने वाले के लिए तो यह (मनुष्य) लोक भी सुखद नहीं है, फिर परलोक (सुखद) कैसे हो सकता है?

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

इस श्लोक में भगवान पिछले श्लोकों में वर्णित यज्ञों के फल का उपसंहार करते हैं। यज्ञ के शेष (प्रसाद) का भोग करने वाले साधक सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यह "प्रसाद" शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि योगी अपने कर्मों के फल के स्वामी स्वयं को न मानकर उसे ईश्वर को अर्पित कर देते हैं और जो कुछ ईश्वर की कृपा से वापस मिलता है, उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यही कर्मयोग का रहस्य है। दूसरी ओर, जो कोई भी यज्ञ (समर्पण भाव से किया गया कर्म) नहीं करता, उसे इस लोक में भी सुख नहीं मिल सकता, क्योंकि उसके कर्मों के शुभ फल नहीं होते और वह आसक्ति में बंधा रहता है। यदि इस लोक में ही सुख नहीं, तो परलोक (स्वर्ग या मोक्ष) में सुख की कल्पना करना तो व्यर्थ है। यह श्लोक सांसारिक जीवन में ही ईश्वर-समर्पित भाव से कर्म करने की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यज्ञ से बचे हुए अमृत (प्रसाद) को भोगने वाले योगीजन सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ न करने वाले के लिए तो यह (मनुष्य) लोक भी सुखद नहीं है, फिर परलोक (सुखद) कैसे हो सकता है? Those who partake of the nectar (the remnants) of a sacrifice attain the eternal Brahman. For one who does not perform any sacrifice, neither this world nor the next is happy, O best of the Kurus.

व्याख्या / Explanation

इस श्लोक का प्रथम भाग यज्ञ करने वालों के लिए आश्वासन है। वे न केवल इस लोक में सुखी रहते हैं, बल्कि परम लक्ष्य ब्रह्म को भी प्राप्त कर लेते हैं। दूसरा भाग उन लोगों के लिए चेतावनी है जो समर्पण भाव से कर्म नहीं करते। उनके लिए यह लोक ही दुखों से भरा है, फिर परलोक में सुख की आशा करना मूर्खता है। यहाँ "यज्ञ" का व्यापक अर्थ है—कोई भी कर्तव्य जो ईश्वर या मानवता के कल्याण के लिए, बिना फल की इच्छा के किया जाए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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