मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदएवम्
इस प्रकार
बहुविधा
अनेक प्रकार के
यज्ञा
यज्ञ
वितता
विस्तृत
ब्रह्मणः
वेदों के
मुखे
मुख में (द्वारा)
कर्मजान्
कर्मों से उत्पन्न
विद्धि
जानो
तान्
उन
सर्वान्
सबको
एवम्
इस प्रकार
ज्ञात्वा
जानकर
विमोक्ष्यसे
मुक्त हो जाओगे।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ वेदों के मुख (द्वारा) विस्तृत रूप से कहे गए हैं। उन सबको कर्मों से उत्पन्न जानो और इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कृष्ण अब यज्ञों का सार समझाते हैं। सभी यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होते हैं। वे चाहे बाह्य हों या आंतरिक, सभी का आधार कर्म है। इन यज्ञों के मूल तत्व (ज्ञान) को समझ लेने पर साधक समस्त कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाता है। यहाँ "ब्रह्मणो मुखे" का अर्थ है वेदों के वचनों द्वारा। वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है, पर उन सबका अंतिम लक्ष्य एक ही है—आत्मज्ञान।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ वेदों के मुख (द्वारा) विस्तृत रूप से कहे गए हैं। उन सबको कर्मों से उत्पन्न जानो और इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे। Thus, manifold sacrifices are spread out in the Vedas. Know them all to be born of action, and knowing thus, you shall be liberated.
व्याख्या / Explanation
भगवान कृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि वेदों में वर्णित सभी प्रकार के यज्ञ (द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ, ज्ञानयज्ञ आदि) अंततः कर्म पर ही आधारित हैं। ये सभी साधन हैं, साध्य नहीं। इन यज्ञों के मूल में जो ज्ञान है—कि कर्ता, कर्म और फल सभी परमात्मा को समर्पित हैं—उस ज्ञान को प्राप्त कर लेने पर साधक कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान ही मुक्ति का सीधा मार्ग है।