मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदश्रेयान्
श्रेष्ठ
द्रव्यमयात्
द्रव्यमय (पदार्थों से सम्पन्न) यज्ञ से
यज्ञात्
यज्ञ से
ज्ञानयज्ञः
ज्ञान-यज्ञ
परन्तप
हे परन्तप (शत्रुतापन)
सर्वम्
सब
कर्म
कर्म
अखिलम्
सम्पूर्ण
पार्थ
हे पार्थ
ज्ञाने
ज्ञान में
परिसमाप्यते
पूर्णतः समाप्त हो जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में ही परिसमाप्त (चरम सीमा को प्राप्त) होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कृष्ण अब स्पष्ट करते हैं कि सभी यज्ञों में सर्वोच्च ज्ञान-यज्ञ है। बाह्य पदार्थों (द्रव्य) से किए गए यज्ञ अपने आप में सीमित हैं, किन्तु ज्ञान-यज्ञ (आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए किया गया प्रयास) सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि यह साधक को मोक्ष के द्वार तक ले जाता है। अंततः सभी कर्मों की परिणति ज्ञान में ही होती है—अर्थात् ज्ञान ही कर्मों का चरम लक्ष्य है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में ही परिसमाप्त (चरम सीमा को प्राप्त) होते हैं। O scorcher of foes, the sacrifice of knowledge is superior to the sacrifice of material possessions. All actions in their entirety, O Partha, culminate in knowledge.
व्याख्या / Explanation
यहाँ ज्ञान-यज्ञ का अर्थ है—आत्मा और परमात्मा के तत्त्व को जानने की साधना। यह यज्ञ केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि अन्तर्मुखी साधना है। सभी बाह्य यज्ञों का अंतिम उद्देश्य अन्तःकरण की शुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति है। जब ज्ञान उदय हो जाता है, तब समस्त कर्मों का लक्ष्य पूर्ण हो जाता है। इसलिए ज्ञान-यज्ञ सबसे श्रेष्ठ है।