श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 34

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 4 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
तत्
उस (ज्ञान) को
विद्धि
जानो
प्रणिपातेन
प्रणिपात (समर्पण) से
परिप्रश्नेन
परिप्रश्न (विनीत प्रश्न) से
सेवया
सेवा से
उपदेक्ष्यन्ति
उपदेश देंगे
ते
तुझे
ज्ञानम्
ज्ञान
ज्ञानिनः
ज्ञानी
तत्त्वदर्शिनः
तत्त्व के दर्शी (साक्षात्कारी)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उस (ज्ञान) को तू प्रणिपात (समर्पण), परिप्रश्न (विनीत प्रश्न) और सेवा द्वारा जान। तत्त्व के साक्षात्कारी ज्ञानीजन तुझे उस ज्ञान का उपदेश देंगे।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक गुरु-शिष्य परम्परा का आधार है। ज्ञान प्राप्त करने के तीन साधन बताए गए हैं—प्रणिपात (गुरु के चरणों में समर्पण), परिप्रश्न (विनीत भाव से प्रश्न करना), और सेवा (गुरु की सेवा)। ऐसे शिष्य को तत्त्वदर्शी गुरु सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं। यहाँ बल इस बात पर है कि ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि साक्षात् गुरु के सान्निध्य से प्राप्त होता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

उस (ज्ञान) को तू प्रणिपात (समर्पण), परिप्रश्न (विनीत प्रश्न) और सेवा द्वारा जान। तत्त्व के साक्षात्कारी ज्ञानीजन तुझे उस ज्ञान का उपदेश देंगे। Know that by prostrating yourself at the feet of the wise, by questioning them, and by serving them, the wise who have realized the Truth will instruct you in that knowledge.

व्याख्या / Explanation

यह श्लोक गुरु-शिष्य सम्बन्ध की महत्ता को रेखांकित करता है। ज्ञान प्राप्ति के लिए तीन शर्तें हैं: (1) प्रणिपात—गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और विनम्रता, (2) परिप्रश्न—जिज्ञासा के साथ स्पष्टीकरण माँगना, और (3) सेवा—गुरु की सेवा करके उनकी कृपा पात्र बनना। ऐसे शिष्य को ही गुरु तत्त्वज्ञान का उपदेश देते हैं। ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता और गुरु-कृपा से प्राप्त होता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
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श्लोक 34/42 81% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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