श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 35

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 4 मिनट का पठन 105 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
यत्
जिस (ज्ञान) को
ज्ञात्वा
जानकर
न
नहीं
पुनः
फिर
मोहम्
मोह को
एवम्
इस प्रकार
यास्यसि
जाओगे
पाण्डव
हे पाण्डव
येन
जिससे
भूतानि
प्राणियों को
अशेषेण
सम्पूर्ण रूप से
द्रक्ष्यसि
देखोगे
आत्मनि
अपने आप में
अथो
तथा
मयि
मुझमें।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे पाण्डव! जिस (ज्ञान) को जानकर तू फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा, और जिसके द्वारा तू सम्पूर्ण प्राणियों को अपने आप में और मुझमें देखेगा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

इस श्लोक में उस ज्ञान के फल का वर्णन है। वह ज्ञान साधक को पुनः मोह में नहीं पड़ने देता। साथ ही, उस ज्ञान के प्रभाव से साधक समस्त प्राणियों को अपने आत्मा में और परमात्मा (कृष्ण) में देखता है—अर्थात् उसे सर्वत्र एक ही चेतना दिखाई देती है। यह अद्वैत दृष्टि का सूचक है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे पाण्डव! जिस (ज्ञान) को जानकर तू फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगा, और जिसके द्वारा तू सम्पूर्ण प्राणियों को अपने आप में और मुझमें देखेगा। Knowing which, O Pandava, you shall not again be deluded like this; and by which you shall see all beings without exception in your own Self and in Me.

व्याख्या / Explanation

ज्ञान की दो विशेषताएँ बताई गई हैं। पहली, यह स्थायी है—एक बार प्राप्त हो जाने पर पुनः मोह नहीं होता। दूसरी, यह सर्वसमावेशी दृष्टि देता है—ज्ञानी सभी प्राणियों में एक ही आत्मा देखता है, और वह आत्मा परमात्मा (कृष्ण) में एकीभूत है। यही वास्तविक ज्ञान है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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