मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदअपि
यद्यपि
चेत्
यदि
असि
तुम हो
पापेभ्यः
पापियों में
सर्वेभ्यः
सबसे
पापकृत्तमः
अधिक पाप करने वाला
सर्वम्
सब
ज्ञानप्लवेन
ज्ञानरूपी नौका द्वारा
एव
ही
वृजिनम्
पाप-समुद्र को
सन्तरिष्यसि
पार कर जाओगे।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यदि तू सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा तू सम्पूर्ण पाप-समुद्र को पार कर जाएगा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक ज्ञान की महिमा का गान करता है। ज्ञान की शक्ति इतनी प्रबल है कि वह सबसे बड़े पापी को भी पापों के समुद्र से पार उतार सकती है। यहाँ ज्ञानप्लव (ज्ञानरूपी नौका) का प्रयोग दर्शाता है कि जैसे नौका बिना डूबे पानी को पार करा देती है, वैसे ही ज्ञान बिना लिप्त हुए पापों के प्रभाव से मुक्त कर देता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
यदि तू सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा तू सम्पूर्ण पाप-समुद्र को पार कर जाएगा। Even if you are the most sinful of all sinners, you shall cross over all sin by the raft of knowledge alone.
व्याख्या / Explanation
यह श्लोक आश्वासन देता है कि ज्ञान की शक्ति अपरिमित है। चाहे व्यक्ति ने कितने ही भयानक पाप किए हों, सच्चा आत्मज्ञान (या ब्रह्मज्ञान) उसे उन सबके प्रभाव से मुक्त कर देता है। ज्ञान, जैसे अग्नि ईंधन को जला देती है, वैसे ही पापों के संस्कारों को नष्ट कर देता है। इसलिए ज्ञान प्राप्ति का प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।