मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदयथा
जैसे
एधांसि
ईंधनों को
समिद्धः
प्रज्वलित
अग्निः
अग्नि
भस्मसात्
भस्म
कुरुते
कर देती है
अर्जुन
हे अर्जुन
ज्ञानाग्निः
ज्ञानरूपी अग्नि
सर्वकर्माणि
सब कर्मों को
भस्मसात्
भस्म
कुरुते
कर देती है
तथा
वैसे ही।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह एक प्रसिद्ध दृष्टान्त है। जैसे आग जलाऊ लकड़ी को जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार ज्ञान की अग्नि समस्त कर्मों के बंधनकारी फलों को भस्म कर देती है। यहाँ सर्वकर्माणि का अर्थ है—सभी प्रकार के कर्म (पुण्य, पाप, मिश्रित) जो जीव को बांधते हैं। ज्ञान होने पर ये सभी कर्म साधक को प्रभावित नहीं कर पाते।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है। As a blazing fire reduces wood to ashes, O Arjuna, so does the fire of knowledge reduce all actions to ashes.
व्याख्या / Explanation
ज्ञान की शक्ति की तुलना अग्नि से की गई है। अग्नि का स्वभाव है जलाना। वह ईंधन के रूप, गुण सब कुछ भस्म कर देती है। उसी प्रकार, ज्ञान होने पर साधक के समस्त कर्म—चाहे वे कितने ही पुराने या सघन क्यों न हों—उनके बीज नष्ट हो जाते हैं और वे फल देने में असमर्थ हो जाते हैं। यह ज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति है।