श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 38

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 4 मिनट का पठन 145 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
न
नहीं
हि
निश्चय ही
ज्ञानेन
ज्ञान के समान
सदृशम्
समान
पवित्रम्
पवित्र
इह
इस (लोक) में
विद्यते
है
तत्
वह (ज्ञान)
स्वयम्
स्वयं
योगसंसिद्धः
योग में सिद्ध
कालेन
काल (समय) के साथ
आत्मनि
अपने आप में
विन्दति
पाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

निश्चय ही इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला और कुछ नहीं है। योग में सिद्ध पुरुष उस (ज्ञान) को समय के साथ अपने आप में पा लेता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक ज्ञान की पवित्रता पर बल देता है। ज्ञान सबसे बड़ा पवित्रकर्ता है—यह मन, बुद्धि और आत्मा को शुद्ध करता है। यह ज्ञान बाहर से नहीं मिलता, बल्कि योग (साधना) द्वारा सिद्ध हुआ व्यक्ति इसे अपने ही अन्तःकरण में प्राप्त करता है। कालेन का अर्थ है कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे, उचित समय पर फलित होती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

निश्चय ही इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला और कुछ नहीं है। योग में सिद्ध पुरुष उस (ज्ञान) को समय के साथ अपने आप में पा लेता है। Verily, there is nothing so pure in this world as knowledge. One who is perfected in Yoga finds it in the Self in course of time.

व्याख्या / Explanation

ज्ञान की विशेषता यह है कि वह न केवल ज्ञाता को शुद्ध करता है, बल्कि वह स्वयं अत्यन्त पवित्र है। इस संसार में कोई भी वस्तु, कोई भी तीर्थ, कोई भी अनुष्ठान ज्ञान के समान पवित्र नहीं है। यह ज्ञान योगाभ्यास द्वारा धीरे-धीरे साधक के हृदय में प्रकट होता है। जैसे-जैसे साधक योग में निष्ठावान होता है, वैसे-वैसे ज्ञान का प्रकाश बढ़ता है और अन्त में वह अपने आत्मा में ही परम ज्ञान को प्राप्त कर लेता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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