मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच | अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः | कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ||४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदअर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
अपरम्
बाद का
भवतः
आपका
जन्म
जन्म
परम्
पहले का
जन्म
जन्म
विवस्वतः
विवस्वान् (सूर्य) का
कथम्
कैसे
एतत्
यह
विजानीयाम्
जानूँ
त्वम्
आपने
आदौ
आदि में
प्रोक्तवान्
कहा था
इति
इस प्रकार।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
अर्जुन बोले: आपका जन्म तो बाद में हुआ और विवस्वान् (सूर्य) का जन्म पहले। जो आपने आदि में कहा था, उसे मैं कैसे समझूँ?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन को संदेह होता है। कृष्ण का जन्म तो हाल का है (लगभग ५००० वर्ष पूर्व), जबकि सूर्य देव तो अनादि काल से हैं। कृष्ण यह कैसे कह सकते हैं कि उन्होंने सूर्य को यह योग सिखाया था? यह संदेह कृष्ण के दिव्य स्वरूप को समझने में अर्जुन की असमर्थता को दर्शाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
अर्जुन बोले: आपका जन्म तो बाद में हुआ और सूर्य का जन्म पहले। फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि आपने आदि में उन्हें यह योग सिखाया था? Arjuna said: Your birth is later, and the birth of Vivasvan is earlier. How am I to understand that You taught this yoga in the beginning?
मानवीय बुद्धि की सीमा / Limit of Human Intellect
यह श्लोक मानवीय बुद्धि की सीमा को दर्शाता है। अर्जुन कृष्ण को साधारण मनुष्य की तरह देख रहे हैं, उनके दिव्य स्वरूप को नहीं पहचान पा रहे। यह प्रश्न कृष्ण को अपने दिव्य जन्म का रहस्य बताने का अवसर देता है। This verse sets the stage for Krishna to reveal the secret of His divine incarnation.