श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga))

अध्याय 4 · श्लोक 5

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 42 3 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच | बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन | तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ||५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
श्रीभगवान्
भगवान
उवाच
बोले
बहूनि
अनेक
मे
मेरे
व्यतीतानि
बीत चुके हैं
जन्मानि
जन्म
तव
तुम्हारे
च
और
अर्जुन
हे अर्जुन
तानि
उनको
अहम्
मैं
वेद
जानता हूँ
सर्वाणि
सभी
न
नहीं
त्वम्
तुम
वेत्थ
जानते हो
परन्तप
हे परन्तप।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, परन्तु हे परन्तप! तुम नहीं जानते।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

कृष्ण यहाँ आत्मा की पुनर्जन्म की यात्रा और ईश्वर की सर्वज्ञता का रहस्य बता रहे हैं। जहाँ साधारण जीव अपने पिछले जन्मों को भूल जाता है, वहीं ईश्वर को सब ज्ञात रहता है। यह कृष्ण के दिव्य स्वरूप का प्रथम संकेत है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कृष्ण ने कहा: हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, परन्तु हे परन्तप! तुम नहीं जानते। The Lord said: Many births of Mine have passed, as well as of yours, O Arjuna. I know them all, but you do not know, O scorcher of foes.

ज्ञान का अन्तर / Difference in Knowledge

यह श्लोक जीव और ईश्वर के ज्ञान के अन्तर को स्पष्ट करता है। जीव का ज्ञान आवृत है, जबकि ईश्वर का ज्ञान सर्वदा प्रकाशित रहता है। This verse establishes the fundamental difference between the limited knowledge of the individual soul and the unlimited knowledge of the Divine.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)
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श्लोक 5/42 12% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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